इठलाती सी, बलखाती सी, सबांबों के रंग उडाती सी, गुलाब की खुशबू की तरह इस फिजा को महकती सी, अभी भी बचपन हो जैसे दिल में बसा, ऐसी मासूमियत से मुस्काती सी, छुई मुई को भी अपनी नाजुक छुंअन से लजाती सी, बाला की, परियो सी खूबसूरती तुम लाई हो, के न जाने किस कायनात से तुम आयी हो, जब से देखा है तुमको बस दिल पे तुम्ही छाई हो, के इतना बता दो हमे किस कायनात से तुम आयी हो... तुम्हारी आँखें जैसे मैखाना, बिन पिए ही हम पर खुमारी छाई है, तुम्हारी मुस्कराहट मोतियों सी , मुकुरती हो तो लगता है ये, सारे जहाँ में खुशी छाई हो, है तुम्हारे चेहरे पर वो नूर, वो हया, वो मासूमियत, जैसे बचपन की मासूमियत किसी ने, ताउम्र दिल में अपने बसाई हो, खूबसूरती तुम्हारी कुछ ऐसी है, जैसे "ख़ूबसूरत" अल्फाज़ ने भी जहाँ में एक नयी मिसाल पाई हो, देखा कर तुम्हे ये लगता "खुदा ने बरसो का वक्त ले, बड़े ही फुर्सत से, खूबसूरती की मिसाल बनाई हो", देख कर तुम्हे यु लगता है, जैसे परियो के जहाँ से कोई परी, इस जहाँ में चली आयी हो, अब न सताओ, बस इतना बता दो, कहाँ है वो परियों का देश जहा से तुम आयी हो. के जब से देखा है ...